बस्तर की स्वप्निल खोज – भाग 1 राजा दंडक
बस्तर के इतिहास की विवेचना के लिए साहित्यिक स्त्रोत, भौगोलिक स्त्रोत और पौराणिक स्त्रोत से अलग अलग कथाएं से प्राप्त होती है , जिसमें ऊपर अन्वेषण करने पर एक हल्की सी छवि दिमाग में उभरती है । आम जन मानस की कहानी, जनजातीय कथाएं और राजसत्ता काल के बस्तर। इन सब का समायोजन ही हमे एक दिशा दे सकता है बस्तर की खोज के रूप में । बस्तर के इतिहास का सबसे प्राचीन स्रोत सीधे तौर पर किसी एक विशिष्ट दस्तावेज़ या पुरातात्विक खोज के रूप में इंगित करना कठिन हो सकता है, क्योंकि इसका इतिहास विभिन्न कालों और साक्ष्यों से मिलकर बना है। हालांकि, बस्तर का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों और प्राचीन अभिलेखों में मिलता है, जो इसके प्राचीनतम इतिहास की झलक देते हैं।
राजा दंडक : राजा दंडक और शुक्राचार्य की कथा ।
बस्तर का क्षेत्र प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र पौराणिक काल में दंडकारण्य के नाम से भी विख्यात था। इस नाम के पीछे भगवान श्री राम के पूर्वजों में से एक, राजा दंडक की कथा है। रामायण के अनुसार, राजा दंडक एक पौराणिक व्यक्ति का हैं जिनके नाम पर 'दंडकारण्य' वन का नाम पड़ा। एक राजा के रूप में, उन्होंने गुरु शुक्राचार्य की बेटी अर्जा के साथ दुर्व्यवहार किया था। इसके परिणामस्वरूप, शुक्राचार्य ने उन्हें और उनके पूरे राज्य को नष्ट होने का श्राप दिया था। इस श्राप के कारण उनका समृद्ध राज्य एक घने और भयानक जंगल में बदल गया, जिसे बाद में दंडकारण्य कहा जाने लगा। यही दंडकारण्य क्षेत्र आज के बस्तर और उसके आसपास के बड़े भूभाग को समाहित करता है, जो इस क्षेत्र के अत्यंत प्राचीन और पौराणिक जुड़ाव को दर्शाता है। इसी दंडकारण्य में भगवान राम ने अपने वनवास का अधिकांश समय व्यतीत किया था। इस कथा में हमे एक अलग ही दृष्टिकोण प्राप्त होता है । सोचने वाली बात है कि गुरु शुक्राचार्य का आश्रम ( तत्कालीन शिक्षा और वैज्ञानिक शोध केंद्र ) लोनार, महाराष्ट्र के दंडकारण्य क्षेत्र में स्थित था, जहाँ उनका एक आश्रम आज भी है। जिसका अर्थ ये प्राप्त होता है कि राजा दंडक के शासन के समय बस्तर अर्थात दंडकारण्य का विस्तार महाराष्ट्र के भूभाग तक रहा होगा । अगर हम एक मानचित्र के रूप में इसे देखने का प्रयास करें तो यह गोदावरी के उत्तर के क्षेत्र से होते हुए महाराष्ट्र के वर्तमान के चंद्रपुर , गढ़चिरौली के क्षेत्र होते हुए उतर में रावघाट तथा कांकेर क्षेत्र तक रहा होगा । पूर्व दिशा में इसकी सीमा वर्तमान उड़ीसा कोरापुट क्षेत्र तक रही होगी । इस क्षेत्र की पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 260 किलोमीटर तथा उतर से दक्षिण 280 किलोमीटर के आसपास रही होगी । सटीक अनुमान तो बहुत कठिन है पर ये विस्तार 57000 वर्ग किलोमीटर से अधिक ही रहा होगा ।
एक माप के लिए हम मान सकते हैं कि उस कालखंड का दंडकारण्य क्षेत्र वर्तमान के केरल या हरियाणा से अधिक बड़ा रहा होगा
राजा दंडक का कालखंड :
राजा दंडक के कालखंड के बारे में केवल काल्पनिक अनुमान ही लगाया जा सकता है, क्योंकि इसका वास्तविक स्त्रोत मिलना असंभव है ।
अगर अंग्रेजी इतिहासकारों का संदर्भ लिया जाए जिनके अनुसार गौतम बुद्ध का जन्म 500 ईसा पूर्ण के आसपास रहा होगा , तो सटीक है कि रामायण का काल खंड उसके पहले का ही है , क्योंकि बुद्धचरित में भगवान बुद्ध के जन्म कि तुलना श्री राम के जन्म से कि गई है । वैदिक काल खंड अगर हम 3500 वर्ष पूर्व का है अर्थात राम का जन्म इसके पहले का ही माना जा सकता है । हम ये कह सकते है कि राम का जन्म 3500 वर्ष पूर्व का ही है । इस तर्क से यह स्वत: स्थापित किया जा सकता है कि राम के पूर्वज राजा दंडक का शासन दंडकारण्य क्षेत्र में 4000 वर्ष पूर्व का ही रहा होगा । जब उत्तर के क्षेत्रों में हड़प्पा और पश्चिम में लोथल जैसे नगर विद्यमान थे । यह तो पुराण और रामायण के उल्लेखों से साफ है कि दंडकारण्य के वन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के नगरों का पूर्ण अभाव रहा है।
वन पर निर्भर रहने वाली जनजातियां ही यहां पर निवास करती थी ।
जैन ग्रंथों में भी दंडक नामक राजा
दंडकारण्य कर्णरवा नदी का तटवर्ती एक वन था । इसके पूर्व यहाँ दंडक नाम का देश तथा दंडक नाम का ही राजा था । इसी राजा के कृत्य से देश वन में परिवर्तित हुआ तथा राजा के नाम के कारण वह इस नाम से संबोधित किया गया । महापुराण 75.554, पद्मपुराण - 40.40-41, 44-45, 92-97
दंडक कर्मकुंडल नगर का राजा । इसकी रानी परिव्राजकों की भक्त थी । एक समय इस राजा ने ध्यानस्थ एक दिगंबर मुनि के गले मे मृत सर्प डलवा दिया था, जिसे बहुत समय तक मुनि के गले में ज्यों का त्यों डला देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ था । राजा की मुनि भक्ति से रानी का गुप्त प्रेमी परिव्राजक असंतुष्ट हुआ । उसने निर्ग्रंथ होकर रानी के साथ व्यभिचार किया । कृत्रिम मुनि के इस कुकृत्य से कुपित होकर इस नृप ने समस्त मुनियों को धानी मे पिलवा दिया था । एक मुनि अन्यत्र चले जाने से मरण से बच गये थे । राजा के इस घृणित कृत्य को देखकर मुनिवर को क्रोध आ गया और उनके मुख से हा निकला कि अग्नि प्रकट हो गयी और उससे सब कुछ भस्म हो गया । पद्मपुराण - 41.58
कार्नरवा या कारणार नदी इंद्रावती का ही प्राचीन नाम होने की पूरी संभावना है
इसके अतिरिक्त, रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों में भी इस क्षेत्र के वन, नदियाँ और यहाँ की जनजातियों का वर्णन मिलता है, जो इसे अत्यंत प्राचीन सिद्ध करता है। पुरातात्विक साक्ष्य, जैसे कि प्राचीन मंदिर, मूर्तियाँ और शिलालेख भी बस्तर के प्राचीन इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, किसी एक "सबसे प्राचीन स्रोत" को निश्चित रूप से बताना जटिल है, क्योंकि यह विभिन्न कालों के साहित्यिक और पुरातात्विक प्रमाणों का एक संयोजन है।
लेख : – स्वप्निल तिवारी
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