बस्तर की स्वप्निल खोज : भाग – २ : राजा श्री राम का बस्तर में वन प्रवास (Bastar Culture)
श्री राम का बस्तर प्रवास: वनवास काल की एक पवित्र यात्रा
भारतीय संस्कृति और आस्था में भगवान श्री राम का वनवास काल अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह माना जाता है कि अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान, भगवान राम ने माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ दंडकारण्य के घने जंगलों से होकर यात्रा की, जिसका एक बड़ा हिस्सा वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य और विशेषकर बस्तर क्षेत्र में पड़ता है। विभिन्न शोधों और मान्यताओं के अनुसार, इस वनवास का समय 5000 ईसा पूर्व से लेकर 7000 ईसा पूर्व के बीच का हो सकता है। वहीं, शोधकर्ता निलेश ओक के अनुसार, भगवान राम का वनवास लगभग 12,240 ईसा पूर्व में शुरू हुआ था।
लोकमान्यताओं और प्राचीन कथाओं के अनुसार, भगवान श्री राम ने अपने वनवास के समय बस्तर में प्रवास किया था। इस दौरान, वहां के राजा ने उनका स्वागत किया था, और इस अवसर पर भोजन का भी आयोजन किया गया था। माता सीता को वहां की वेशभूषा के अनुसार वस्त्र आदि पहनाए गए थे, जो इस क्षेत्र से उनके जुड़ाव को दर्शाता है। चूंकि भगवान राम ने वनवास का आदेश स्वीकार किया था और वे नगरों अथवा ग्रामों में प्रवेश नहीं करते थे, अतः उनका बस्तर के घने वन इलाकों से होकर गुजरने की संभावना और भी प्रबल हो जाती है।
छत्तीसगढ़ में कई ऐसे स्थल हैं, जिनके बारे में यह मान्यता है कि भगवान राम और माता सीता ने यहां कुछ समय व्यतीत किया था। इंद्रावती नदी के किनारे स्थित कई स्थानों पर भी श्री राम के प्रवास की मान्यता है। इसी कड़ी में, यह भी माना जाता है कि माता शबरी के नाम पर ही बस्तर की एक नदी का नाम शबरी नदी पड़ा है, जो इस क्षेत्र के रामायणकालीन महत्व को और पुष्ट करता है। शबरी स्वयं एक वन में रहने वाली वनवासी साध्वी थी जो निरंतर साधना में लिन रहती थी । शबरी की श्री राम के प्रति बहुत अधिक श्रद्धा थी। इसके अतिरिक्त, प्रसिद्ध तीरथगढ़ जलप्रपात और चित्रकूट जलप्रपात जैसे स्थानों पर भी भगवान राम के पदचिह्न या उनके प्रवास की संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं।
सुकमा जिला मुख्यालय से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रामाराम गांव भी एक ऐसा महत्वपूर्ण स्थल है, जहां भगवान श्री राम की निशानी होने की मान्यता है और यह राम वन गमन पर्यटन परिपथ का भी हिस्सा है। उत्तर भारत से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करने के बाद भगवान राम दक्षिण भारत की ओर रवाना हुए थे, इसीलिए छत्तीसगढ़ को दक्षिणापथ भी कहा जाता है। रामाराम का शबरी नदी के करीब होना इस बात का भी एक प्रमाण माना जाता है कि भगवान राम ने बस्तर को ही अपना वन गमन मार्ग चुना होगा। सबसे प्रमुख बात यह भी है कि वानरराज सुग्रीव के प्रमुख साथी नल का क्षेत्र बस्तर ही था, जो इस क्षेत्र के रामायणकालीन संबंध को और अधिक पुष्ट करता है।
यह भी संभावना व्यक्त की जाती है कि भगवान राम का पंचवटी आश्रम इंद्रावती और गोदावरी नदियों के संगम के समीप रहा होगा, क्योंकि रामायण के अनुसार राम छत्तीसगढ़ के मार्ग से गए थे। इस तर्क के पीछे यह विचार है कि यदि पंचवटी नासिक के समीप होती, तो भगवान राम को नर्मदा नदी पार करके सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला को भी पार करना पड़ता, जिसका वर्णन रामायण में कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं मिलता है। वाल्मीकि रामायण में भी राम के नर्मदा को पार करने का वर्णन नहीं किया गया है। इन पवित्र स्थलों पर आज भी उनके पदचिह्न और उनसे जुड़ी स्मृतियां मौजूद हैं, जो बस्तर को रामायणकालीन इतिहास से जोड़ती हैं।
शबरी नदी और गोदावरी के संगम स्थल से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित भद्राचलम भी एक उपयुक्त विकल्प हो सकता है पंचवटी नामक स्थान का । कुछ विद्वान और विश्लेषक भी इस बात पर जोर देते हैं कि वास्तविक पंचवटी भद्राचलम के पास ही थी, जो रामायण में वर्णित दिशा और घटनाओं से मेल खाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पर्णशाला ही वह स्थान था जहाँ से रावण ने माता सीता का अपहरण किया था।
बस्तर संभाग में सूर्य पूजा के प्रमाण
राम सूर्यवंशी थे , बस्तर क्षेत्र से सूर्य उपासना के कई प्रमाण प्राप्त हुए हैं। छठी शताब्दी ईस्वी में नलवंशीय शासक विलासतुंग के अभिलेख में सूर्य की स्तुति की गई है, जिससे ज्ञात होता है कि नलवंश सूर्य को देवता के रूप में पूजता था।
बस्तर के जगदलपुर संग्रहालय में कुरूशपाल से प्राप्त 12वीं–13वीं शताब्दी की सूर्य प्रतिमा सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त बस्तर से अन्य सूर्य प्रतिमाएँ भी मिली हैं जो इस क्षेत्र की सूर्य उपासना की परंपरा को प्रमाणित करती हैं।
राम सूर्यवंशी थे , बस्तर क्षेत्र से सूर्य उपासना के कई प्रमाण प्राप्त हुए हैं। छठी शताब्दी ईस्वी में नलवंशीय शासक विलासतुंग के अभिलेख में सूर्य की स्तुति की गई है, जिससे ज्ञात होता है कि नलवंश सूर्य को देवता के रूप में पूजता था।
बस्तर के जगदलपुर संग्रहालय में कुरूशपाल से प्राप्त 12वीं–13वीं शताब्दी की सूर्य प्रतिमा सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त बस्तर से अन्य सूर्य प्रतिमाएँ भी मिली हैं जो इस क्षेत्र की सूर्य उपासना की परंपरा को प्रमाणित करती हैं।
इस प्रकार, बस्तर केवल अपनी जनजातीय संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि भगवान श्री राम के वनवास काल से जुड़े एक पवित्र पड़ाव के रूप में भी जाना जाता है, जो इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को बढ़ाता है।
लेखक : स्वप्निल तिवारी
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