बस्तर में धर्मांतरण के शुरुवात की एक विवेचना । - तेजस्वी

बस्तर में धर्मांतरण की एक विवेचना :

बस्तर को सदैव ही लोक संस्कृति व सभ्यता आदिवासी पुरातन मान्यताओं से भरा पूरा एक भूमि के रूप में देखा जाता है । पर विगत कुछ दशकों से इस भूमि पर भी विदेशी पाश्चात्य संस्कृति का हस्तक्षेप लगातार बढ़ता दिख रहा है । बड़ी संख्या में लोगों का धर्मांतरण हो रहा है और इसमें ईसाई मिशनरिया बड़े पैमाने  पर काम करते दिख रही है। कई आदिवासियों को पथ भ्रमित करते हुए उन्हें उनकी मूल संस्कृति से दूर करके धर्मांतरण किया जा रहा है , और आने वाले वर्षों में यह एक विकराल भयावह रूप लेता दिख रहा है । अपनी मूल जड़ से जुड़े आदिवासी जोकि देव गुड़ी में अपने देवी देवताओं की पूजा करते हैं आज भी अपनी पुरातन संस्कृति और मान्यताओं को अपनी धरोहर के रूप में धारण किए हुए हैं , उनको लगातार ईसाई मिशनरियों व उनके द्वारा धर्मआतरित लोग परेशान करते आ रहे हैं और अब इनके बीच एक टकराव की स्थिति भी उत्पन्न हो रही है । 
 ईसाई मिशनरियों द्वारा किए जा रहे इस धर्मांतरण को अगर समझना है तो हमें इनके शुरुआत से लेकर वर्तमान की परिस्थिति को जानना होगा ।

इतिहास  :

1910 के आसपास की बात है जब गुंडाधुर और उनके साथियों ने अंग्रेजी शासन व उनके सहयोगियों द्वारा किए अत्याचार के विरोध में एक बड़ा आंदोलन किया था और उन्होंने इस लड़ाई में कहीं ना कहीं अंग्रेजों को काफी हद तक चोट भी पहुंचाई थी । उस समय बहुत से बड़े अंग्रेज अफसर यह समझ चुके थे कि अगर उन्हें बस्तर में अपनी जड़ें जमाना है तो यहां के लोगों की मूल संस्कृति को समाप्त करना ही होगा । उस वक्त चलने वाला ब्रिटिश पीनल कोड ब्रिटिश कानून ज्यादातर अंग्रेजी भाषा में हुआ करते थे , जिसे समझना आम भारतीय के लिए दूर की बात थी तो जरा सोचिए कि जंगलों में निवास करने वाले आदिवासियों के लिए इन कानूनों का पालन करना और उस कानून के चक्कर में फस ना कितना बुरा रहा होगा ।
और उनकी इस परेशानी का फायदा उठाते हुए ईसाई मिशन होने छत्तीसगढ़ और बस्तर के इलाकों पर अपनी घुसपैठ करनी शुरू कर दी । अपनी शुरुआत में वे लोग बस्तर के आदिवासी तथा छत्तीसगढ़ के जसपुर सरगुजा जैसे इलाकों के आदिवासियों को कानूनी सहायता देने के माध्यम से उनके ऊपर एहसान जताने लगे , विभिन्न प्रकार की कानूनी प्रकरणों में सहायता के लिए ईसाई मिशनरी से जुड़े वकील लोगों की मदद करते वह बदले में उन्हें धर्मपरिवर्तित करते थे ।
आम छत्तीसगढ़ी बस्तरिया व्यक्ति जो अंग्रेजों के कानूनों में पढ़कर अपने जल जंगल व जमीन से हाथ धो लेता उसके लिए धर्मप्रीत होकर अपनी जमीन बचाना ज्यादा आसान था और इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए बस्तर में शुरुआती तौर पर बड़े पैमाने पर आदिवासियों का अन्य समुदाय के लोगों का धर्मांतरण किया गया ।

: छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक ईसाई बहुल इलाके जसपुर में तो धर्मांतरण की शुरुआत 1860 के दशक में ही हो चुकी थी । 1857 के विद्रोह में छत्तीसगढ़ के बहुत से इलाकों में अंग्रेजों के विरुद्ध सक्रियता दिखी इसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने ईसाई मिशनरियों को एक कार्य सौंपा जिसके तहत उन्हें पूरी ऐसी पंक्ति खड़ी करनी थी जो अंग्रेजों के तौर-तरीकों को माने और उनके धर्म के तरीकों को अपने मन से स्वीकार है और इसके लिए उनका धर्मांतरण होना बहुत आवश्यक था । अंग्रेजो ने खुले तौर पर समर्थन करना शुरू कर दिया और हर संभव सहायता उन्हें देना शुरू किया अगर खासतौर पर जसपुर की कुनकुरी इलाके की बात की जाए तो 1920 आते-आते यहां के बहुत से इलाकों में ईसाई धर्म का प्रादुर्भाव बड़ी मजबूती के साथ हो चुका था ।

बीबीसी को 02 जनवरी 2015 को प्रकाशित एक इंटरव्यू में , ब्रिटेन के एक विश्वविद्यालय से स्नातक कुनकुरी के रहने वाले अभय खाखा बताते हैं, " जशपुर इलाके में शिक्षा या स्वास्थ्य के बजाए ईसाई मिशनरी ने शुरुआती दौर में क़ानूनी सहायता देकर आदिवासियों का दिल जीता. अंग्रेज़ी सरकार की कचहरियों से मिलने वाला नोटिस किसी आदिवासी के लिए बंदूक की गोली से कहीं अधिक खतरनाक होती थी."
खाखा मानते हैं कि ईसाई धर्म प्रचारकों ने आदिवासियों के लिए अबूझ भाषा में मिलने वाले सरकारी नोटिसों के मामले में उनकी क़ानूनी मदद की । उनकी सहानुभूति पाकर आदिवासियों ने ईसाई धर्म को स्वीकार करना शुरू किया ।


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